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Wednesday, May 12, 2021

दहेज़ प्रथा पर निबंध | Essay on Dowry System in Hindi

दहेज़ प्रथा हमारे समाज की एक सबसे बड़ी कुरुति, जिसने अभी तक जबकि हम सब इकीसवीं सदी में रहते है, एक अभिशाप की भावना पैदा कर रखी है। इस दहेजप्रथा के कारण न जाने कितनी स्त्रियों का जीवन नरक बन गया है और न जाने कितनी इस दहेज की आग में झुलस चुकी है। हमारे देश भारत में इस कुरुति का ज़्यादातर प्रचलन हुआ करता है, और ज़्यादातर देश भर का निर्धन वर्ग इस समस्या से ज़्यादा प्रभावित है। यह हमारे समाज को खोखला तो करता ही है और साथ ही साथ वैवाहिक जीवन को भी छति पहुँचाता है।

दोस्तों, आज हम आपके समक्ष साझा करते है दहेज़ प्रथा पर निबंध जिससे कि आप सब दहेज़ प्रथा जैसी कुरुति के बारे में समझ सकें व लोगों में इसके प्रति जागरूकता ज़ाहिर कर सकें। यह Essay on Dowry System in Hindi कक्षा 1, 2, 3, 4, 5, 6, 7, 8, 9, 10, 11, 12 और कॉलेज के विद्यार्थियों अत्यंत महत्वपूर्ण साबित होगा और इनसे विद्यार्थियों को काफ़ी कुछ सीख मिलेगी, ताकि वह अपनी पढ़ाई के माध्यम से दहेज़ प्रथा जैसे गंभीर समस्या को समझ पाएंगे।

दहेज़ प्रथा पर निबंध | Essay on Dowry System in Hindi


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Essay on Dowry System in Hindi

Essay on Dowry System in Hindi


Essay 1

दहेज प्रथा भारतीय समाज के निर्धन वर्ग के लिए अभिशाप और चुनौती है। दहेज प्रथा में नकद और विलासितापूर्ण वस्तुओं की माँग की जाती है। यह हमारे समाज की बहुत बुरी बुराई है। दहेज विवाहित जीवन के सुख को नष्ट करता है। हजारों निर्दोष लड़कियों को इस बुराई के कारण अपना बलिदान करना पड़ता है।

मनु और कालिदास के समय में भी दहेज प्रथा थी लेकिन उस समय यह एक मधुर प्रथा थी दुल्हन के माता-पिता अपनी खुशी से नये जोड़ों को गृहस्थी चलाने हेतु दहेज दिया करते थे।

लेकिन आज दहेज प्रथा ने भयावह रूप धारण कर लिया है। यह भारतीय समाज के लिए अभिशाप बन चुका है। प्रत्येक लड़के का विभिन्न मूल्य लगाया जाता है। यह उसके विभिन्न पद तथा स्थिति के अनुसार लगाया जाता है। लड़की के लिये किसी पद स्थिति की बाध्यता नहीं है। इस भयंकर दहेज रूपी कुप्रथा के अनेक कारण हैं जिनमें से मुख्य हमारे समाज में फैली पुरानी गलत परम्परायें, प्रथायें, जातिवाद, असमान संबंध दम्य धन का लाल गलत आर्थिक व्यवस्था एवं सामाजिक प्रतिष्ठा आदि है।

प्रतिदिन खबरों एवं समाचार पत्रों में भोली-भाली लड़कियों की नृशंस हत्याओं की खबरें आती है क्यों उनको दहेज की इच्छा को पूरी नहीं कर पाती हैं। इसकी वजह से मानसिक अवसाद, पारिवारिक कलह, गरीबी-तंगहाली तथा आत्महत्या जैसे मामले सामने आते हैं। इसके लिये लड़का एवं लड़की दोनों ही पश्च बराबर दोषी हैं। यह कुप्रथा हमारे समाज के चेहरे पर एक बदनुमा दाग है। सरकार ने भी इस पर रोक लगायी है और इसके दोषियों के लिये कठोर दण्ड का प्रावधान भी रखा है। लड़के व लड़कियों को भी दहेज की मांग पर उस शादी के प्रस्ताव को ठुकराना चाहिये।

दहेज़ प्रथा पर निबंध


Essay 2

भारतीय संस्कृति में विवाह को एक आध्यात्मिक कार्य, आत्माओं का मिलन, पवित्र संस्कार और धर्म समाज का आवश्यक अंग माना जाता है। ऐसा भी भारतीय एवं पाश्चात्य दोनों सभ्यता-संस्कृतियों में माना और कहा जाता है कि 'विवाह स्वर्ग में तय किये जाते हैं। अर्थात दो व्यक्तियों (स्त्री-पुरुष) का पारस्परिक विवाह सम्बन्ध पहले से ही निश्चय एवं निर्धारित हुआ करता है।

हमारे विचार में पहले-पहल जब विवाह नामक संस्था का आरम्भ हुआ होगा, तो मूल भावना सम्बन्धों को स्वस्थ स्वरूप देने और जीवन तथा समाज को अनुशासन देने की रही होगी, क्योंकि तबका जीवन पवित्र एवं आदर्श हुआ करता था, इस कारण विवाह कार्य का सम्बन्ध धर्म से भी जोड़ दिया गया होगा ताकि इनके डर से विवाहित जोड़े और भी अधिक अनुशासन में नियम से रह सकें। परन्तु विवाह के साथ दान-दक्षिण और लेन-देन की प्रथा यानि दहेज प्रथा कैसे जुड़ गई ? इन सबका कहीं न तो स्पष्ट उल्लेख ही मिलता है और न ही कोई प्रत्यक्ष कारण ही दिखाई देता है। हम एक तरह से सहज अनुमान कर सकते हैं कि विवाहित जोड़े को एक नए जीवन में प्रवेश करना होता है, एक घर बसाना होता है, तो ऐसा करते समय उन्हें किसी भी तरह की आर्थिक असुविधा एवं सामाजिक दुविधा न रहे, इस कारण कन्यापक्ष या वरपक्ष और रिश्ते-नातों या बिरादरी वालों की तरफ से कुछ उपहार देने का प्रचलन हुआ होगा। इसी ने आगे चलकर दहेज का स्वरूप धारण कर लिया होगा। इस प्रकार सदाशय प्रकट करने वाली एक अच्छी प्रथा आज किस सीमा तक प्रदूषण और सामाजिक समस्या बन चुकी है, यह किसी से छिपा नहीं।

हमें लगता है बाढ़ में राजा-महाराजाओं और धनी वर्गों ने अपना बड़प्पन जताने के लिए बढ़-चढ़ कर उपहार देना और उनका खुला प्रदर्शन करना भी आरम्भ कर दिया होगा, सो यह प्रदर्शन की प्रवृत्ति भी बढ़कर एक अच्छी प्रथा को अभिशाप बनाने में सहायक हुई।

आज धर्म, समाज, राजनीति आदि किसी भी क्षेत्र में किसी भी तरह का आदर्श नहीं रह गया। सभी क्षेत्रों का भ्रष्टाचार आकण्ठ में डूब चुका है। धन ही माता-पिता, धर्म, समाज, नीति-नैतिकता, देवता और भगवान बन चुका है। सो आज हम जो दहेज जन्य हत्याओं के ब्योरों से समाचारों को भरा हुआ पाते हैं, उसका मूल कारण धन की कभी भी समाप्त न होने वाली भूख ही है। कन्या पक्ष से धन ही नकद या उपकरणों के रूप में अधिक से अधिक कैश लेने की इच्छा और दबाव ही दहेज हत्याओं के मूल में विद्यमान है।

आज मानवता या मानवीय आदर्शों का कोई मूल्य एवं महत्त्व नहीं रह गया है, बल्कि वर पक्ष के लिए एक प्रकार का व्यापार बन गया है। ये व्यापार करते समय वर पक्ष यह भूल जाता है कि उसके घर में कन्याएँ हैं। कई बार तो उन्हीं कन्याओं के विवाह निपटाने के लिए भी अधिक से अधिक दहेज की माँग की जाती है। ऐसा करने में अकसर नारियों का हाथ ही प्रमुख रहता है। इस प्रकार आज दहेज के नाम पर नारी ही नारी की शत्रु प्रमाणित हो रही है।

प्रश्न उठता है कि आखिर इस घिनौनी प्रथा से छुटकारे का उपाय क्या है ? उपाय के रूप में सबसे पहली आवश्यकता तो सामाजिक मूल्यों और मानसिकता को पूरी तरह बदलने की है। फिर युवा वर्ग को दहेज को लेकर विवाह करने से एकदम इनकार कर देने की जरूरत है। बड़े-बूढ़े लाख चाहते रहें, यदि युवा वर्ग सत्याग्रही बनकर अपने दहेज विरोधी निर्णय पर अड़ा रहेगा, तभी इस कुप्रथा का अन्त संभव हो पाएगा, अन्यथा कोई भी उपाय इस सामाजिक कोढ़ से छुटकारा नहीं दिला सकता है।

दोस्तों व प्यारे बच्चों हमें आशा है कि आपको यह Essay on Dowry System in Hindi जरूर पसंद आया होगा। अगर यह दहेज़ प्रथा पर निबंध अच्छा लगा हो तो इसे अपने मित्रों के साथ शेयर अवश्य करिए, ताकि वह भी दहेज़ प्रथा जैसी गंभीर समस्या से जागरूक हो सकें और इससे निपटने के लिए अपना योगदान दे सकें।

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